श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अहो अमी देववरामरार्चितं

पादाम्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्।

नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन-

स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ ५

aho amī devavarāmarārcitaṃ

pādāmbujaṃ te sumanaḥphalārhaṇam|

namantyupādāya śikhābhirātmana-

stamo'pahatyai tarujanma yatkṛtam|| 5

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवशिरोमणे! यों तो बड़े-बड़े देवता आपके चरणकमलोंकी पूजा करते हैं; परन्तु देखिये तो, ये वृक्ष भी अपनी डालियोंसे सुन्दर पुष्प और फलोंकी सामग्री लेकर आपके चरणकमलोंमें झुक रहे हैं, नमस्कार कर रहे हैं। क्यों न हो, इन्होंने इसी सौभाग्यके लिये तथा अपना दर्शन एवं श्रवण करनेवालोंके अज्ञानका नाश करनेके लिये ही तो वृन्दावनधाममें वृक्ष-योनि ग्रहण की है। इनका जीवन धन्य है॥ ५॥✎ 2073

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2073 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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