श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं

गायन्त आदिपुरुषानुपदं भजन्ते।

प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या

गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम्॥ ६

ete'linastava yaśo'khilalokatīrthaṃ

gāyanta ādipuruṣānupadaṃ bhajante|

prāyo amī munigaṇā bhavadīyamukhyā

gūḍhaṃ vane'pi na jahatyanaghātmadaivam|| 6

अर्थ

आदिपुरुष! यद्यपि आप इस वृन्दावनमें अपने ऐश्‍वर्यरूपको छिपाकर बालकोंकी-सी लीला कर रहे हैं, फिर भी आपके श्रेष्ठ भक्त मुनिगण अपने इष्टदेवको पहचानकर यहाँ भी प्रायः भौंरोंके रूपमें आपके भुवन-पावन यशका निरन्तर गान करते हुए आपके भजनमें लगे रहते हैं। वे एक क्षणके लिये भी आपको नहीं छोड़ना चाहते॥ ६॥✎ 2073

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2073 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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