श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

विषाम्भस्तदुपस्पृश्य दैवोपहतचेतसः।

निपेतुर्व्यसवः सर्वे सलिलान्ते कुरूद्वह॥ ४९

viṣāmbhastadupaspṛśya daivopahatacetasaḥ|

nipeturvyasavaḥ sarve salilānte kurūdvaha|| 49

अर्थ

परीक्षित्! होनहारके वश उन्हें इस बातका ध्यान ही नहीं रहा था। उस विषैले जलके पीते ही सब गौएँ और ग्वालबाल प्राणहीन होकर यमुनाजीके तटपर गिर पड़े॥ ४९॥✎ 2074

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2074 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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