श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तं नर्तुमुद्यतमवेक्ष्य तदा तदीय-

गन्धर्वसिद्धसुरचारणदेववध्वः ।

प्रीत्या मृदंगपणवानकवाद्यगीत-

पुष्पोपहारनुतिभिः सहसोपसेदुः॥ २७

taṃ nartumudyatamavekṣya tadā tadīya-

gandharvasiddhasuracāraṇadevavadhvaḥ |

prītyā mṛdaṃgapaṇavānakavādyagīta-

puṣpopahāranutibhiḥ sahasopaseduḥ|| 27

अर्थ

भगवान्‌के प्यारे भक्त गन्धर्व, सिद्ध, देवता, चारण और देवांगनाओंने जब देखा कि भगवान् नृत्य करना चाहते हैं, तब वे बड़े प्रेमसे मृदंग, ढोल, नगारे आदि बाजे बजाते हुए, सुन्दर-सुन्दर गीत गाते हुए, पुष्पोंकी वर्षा करते हुए और अपनेको निछावर करते हुए भेंट ले-लेकर उसी समय भगवान्‌के पास आ पहुँचे॥ २७॥✎ 1983 2076

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1983 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पैंरोंकी → पैरोंकी
  • #2076 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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