परीक्षित्! कालिय नागके एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस सिरको नहीं झुकाता था, उसीको प्रचण्ड दण्डधारी भगवान् अपने पैरोंकी चोटसे कुचल डालते। इससे कालिय नागकी जीवनशक्ति क्षीण हो चली, वह मुँह और नथुनोंसे खून उगलने लगा। अन्तमें चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया॥ २८॥✎ 19832076
यद् यच्छिरो न नमतेऽङ्ग शतैकशीर्ष्ण-
स्तत्तन् ममर्द खरदण्डधरोऽङ्घ्रिपातैः।
क्षीणायुषो भ्रमत उल्बणमास्यतोऽसृङ्
नस्तो वमन् परमकश्मलमाप नागः॥ २८
परीक्षित्! कालिय नागके एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस सिरको नहीं झुकाता था, उसीको प्रचण्ड दण्डधारी भगवान् अपने पैरोंकी चोटसे कुचल डालते। इससे कालिय नागकी जीवनशक्ति क्षीण हो चली, वह मुँह और नथुनोंसे खून उगलने लगा। अन्तमें चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 242) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1983 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पैंरोंकी → पैरोंकी