श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यां

शान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः।

शान्ताः प्रियास्ते ह्यधुनावितुं सतां

स्थातुश्‍च ते धर्मपरीप्सयेहतः॥ ५०

tasyaiva te'mūstanavastrilokyāṃ

śāntā aśāntā uta mūḍhayonayaḥ|

śāntāḥ priyāste hyadhunāvituṃ satāṃ

sthātuśca te dharmaparīpsayehataḥ|| 50

अर्थ

त्रिलोकीमें तीन प्रकारकी योनियाँ हैं—सत्त्वगुणप्रधान शान्त, रजोगुणप्रधान अशान्त और तमोगुणप्रधान मूढ। वे सब-की-सब आपकी लीला-मूर्तियाँ हैं। फिर भी इस समय आपको सत्त्वगुणप्रधान शान्तजन ही विशेष प्रिय हैं। क्योंकि आपका यह अवतार और ये लीलाएँ साधुजनोंकी रक्षा तथा धर्मकी रक्षा एवं विस्तारके लिये ही हैं॥ ५०॥

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