श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अपराधः सकृद् भर्त्रा सोढव्यः स्वप्रजाकृतः।

क्षन्तुमर्हसि शान्तात्मन् मूढस्य त्वामजानतः॥ ५१

aparādhaḥ sakṛd bhartrā soḍhavyaḥ svaprajākṛtaḥ|

kṣantumarhasi śāntātman mūḍhasya tvāmajānataḥ|| 51

अर्थ

शान्तात्मन्! स्वामीको एक बार अपनी प्रजाका अपराध सह लेना चाहिये। यह मूढ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिये इसे क्षमा कर दीजिये॥ ५१॥

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