भगवन्! कृपा कीजिये; अब यह सर्प मरने ही वाला है। साधुपुरुष सदासे ही हम अबलाओंपर दया करते आये हैं। अतः आप हमें हमारे प्राणस्वरूप पतिदेवको दे दीजिये॥ ५२॥
अनुगृह्णीष्व भगवन् प्राणांस्त्यजति पन्नगः।
स्त्रीणां नः साधुशोच्यानां पतिः प्राणः प्रदीयताम्॥ ५२
भगवन्! कृपा कीजिये; अब यह सर्प मरने ही वाला है। साधुपुरुष सदासे ही हम अबलाओंपर दया करते आये हैं। अतः आप हमें हमारे प्राणस्वरूप पतिदेवको दे दीजिये॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 247) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/52/