श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के चरणोंकी ठोकरोंसे कालिय नागके फण छिन्न-भिन्न हो गये थे। वह बेसुध हो रहा था। जब नागपत्नियोंने इस प्रकार भगवान्की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया॥ ५४॥
इत्थं स नागपत्नीभिर्भगवान् समभिष्टुतः।
मूर्च्छितं भग्नशिरसं विससर्जाङ्घ्रिकुट्टनैः॥ ५४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के चरणोंकी ठोकरोंसे कालिय नागके फण छिन्न-भिन्न हो गये थे। वह बेसुध हो रहा था। जब नागपत्नियोंने इस प्रकार भगवान्की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 247) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/16/54/