श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

प्रतिलब्धेन्द्रियप्राणः कालियः शनकैर्हरिम्।

कृच्छ्रात् समुच्छ्वसन् दीनः कृष्णं प्राह कृतांजलिः॥ ५५

pratilabdhendriyaprāṇaḥ kāliyaḥ śanakairharim|

kṛcchrāt samucchvasan dīnaḥ kṛṣṇaṃ prāha kṛtāṃjaliḥ|| 55

अर्थ

धीरे-धीरे कालिय नागकी इन्द्रियों और प्राणोंमें कुछ-कुछ चेतना आ गयी। वह बड़ी कठिनतासे श्‍वास लेने लगा और थोड़ी देरके बाद बड़ी दीनतासे हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोला॥ ५५॥

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