श्रीशुकदेवीजीने कहा—परीक्षित्! पूर्वकालमें गरुडजीको उपहार स्वरूप प्राप्त होनेवाले सर्पोंने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मासमें निर्दिष्ट वृक्षके नीचे गरुडको एक सर्पकी भेंट दी जाय॥ २॥
उपहार्यैः सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलिः।
वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ् निरूपितः॥ २
श्रीशुकदेवीजीने कहा—परीक्षित्! पूर्वकालमें गरुडजीको उपहार स्वरूप प्राप्त होनेवाले सर्पोंने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मासमें निर्दिष्ट वृक्षके नीचे गरुडको एक सर्पकी भेंट दी जाय॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 249) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/2/