॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.18.28
अथागतस्मृतिरभयो रिपुं बलो
विहायसार्थमिव हरन्तमात्मनः।
रुषाहनच्छिरसि दृढेन मुष्टिना
सुराधिपो गिरिमिव वज्ररंहसा॥ २८
athāgatasmṛtirabhayo ripuṃ balo
vihāyasārthamiva harantamātmanaḥ|
ruṣāhanacchirasi dṛḍhena muṣṭinā
surādhipo girimiva vajraraṃhasā|| 28
अर्थ
परन्तु दूसरे ही क्षण अपने स्वरूपकी याद आते ही उनका भय जाता रहा। बलरामजीने देखा कि जैसे चोर किसीका धन चुराकर ले जाय, वैसे ही यह शत्रु मुझे चुराकर आकाश-मार्गसे लिये जा रहा है। उस समय जैसे इन्द्रने पर्वतोंपर वज्र चलाया था, वैसे ही उन्होंने क्रोध करके उसके सिरपर एक घूँसा कसकर जमाया॥ २८॥