श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.18.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स आहतः सपदि विशीर्णमस्तको

मुखाद् वमन् रुधिरमपस्मृतोऽसुरः।

महारवं व्यसुरपतत् समीरयन्

गिरिर्यथा मघवत आयुधाहतः॥ २९

sa āhataḥ sapadi viśīrṇamastako

mukhād vaman rudhiramapasmṛto'suraḥ|

mahāravaṃ vyasurapatat samīrayan

giriryathā maghavata āyudhāhataḥ|| 29

अर्थ

घूँसा लगना था कि उसका सिर चूर-चूर हो गया। वह मुँहसे खून उगलने लगा, चेतना जाती रही और बड़ा भयंकर शब्द करता हुआ इन्द्रके द्वारा वज्रसे मारे हुए पर्वतके समान वह उसी समय प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २९॥

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