श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.18.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यत्र निर्झरनिर्ह्रादनिवृत्तस्वनझिल्लिकम्।✎ 1149

शश्‍वत्तच्छीकरर्जीषद्रुममण्डलमण्डितम्॥ ४

yatra nirjharanirhrādanivṛttasvanajhillikam|

śaśvattacchīkararjīṣadrumamaṇḍalamaṇḍitam|| 4

अर्थ

झींगुरोंकी तीखी झंकार झरनोंके मधुर झर-झरमें छिप गयी थी। उन झरनोंसे सदा-सर्वदा बहुत ठंडी जलकी फुहियाँ उड़ा करती थीं, जिनसे वहाँके वृक्षोंकी हरियाली देखते ही बनती थी॥ ४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1149 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निर्झरनिर्हृदनिवृत्तस्वनझिल्लिकम्। → निर्झरनिर्ह्रादनिवृत्तस्वनझिल्लिकम्।

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