‘देवि! कल्याणी! तुम व्रजमें जाओ! वह प्रदेश ग्वालों और गौओंसे सुशोभित है। वहाँ नन्दबाबाके गोकुलमें वसुदेवकी पत्नी रोहिणी निवास करती हैं। उनकी और भी पत्नियाँ कंससे डरकर गुप्त स्थानोंमें रह रही हैं॥ ७॥
गच्छ देवि व्रजं भद्रे गोपगोभिरलंकृतम्।
रोहिणी वसुदेवस्य भार्याऽऽस्ते नन्दगोकुले।
अन्याश्च कंससंविग्ना विवरेषु वसन्ति हि॥ ७
‘देवि! कल्याणी! तुम व्रजमें जाओ! वह प्रदेश ग्वालों और गौओंसे सुशोभित है। वहाँ नन्दबाबाके गोकुलमें वसुदेवकी पत्नी रोहिणी निवास करती हैं। उनकी और भी पत्नियाँ कंससे डरकर गुप्त स्थानोंमें रह रही हैं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.2.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 129) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/2/7/