श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

धनुर्वियति माहेन्द्रं निर्गुणं च गुणिन्यभात्।

व्यक्ते गुणव्यतिकरेऽगुणवान् पुरुषो यथा॥ १८

dhanurviyati māhendraṃ nirguṇaṃ ca guṇinyabhāt|

vyakte guṇavyatikare'guṇavān puruṣo yathā|| 18

अर्थ

आकाश मेघोंके गर्जन-तर्जनसे भर रहा था। उसमें निर्गुण (बिना डोरीके) इन्द्रधनुषकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी सत्त्व-रज आदि गुणोंके क्षोभसे होनेवाले विश्‍वके बखेड़ेमें निर्गुण ब्रह्मकी॥ १८॥✎ 1664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1664 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आदेशा-नुसार → आदेशानुसार

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