॥ श्रीहरिः ॥
धनुर्वियति माहेन्द्रं निर्गुणं च गुणिन्यभात्।
व्यक्ते गुणव्यतिकरेऽगुणवान् पुरुषो यथा॥ १८
dhanurviyati māhendraṃ nirguṇaṃ ca guṇinyabhāt|
vyakte guṇavyatikare'guṇavān puruṣo yathā|| 18
अर्थ
आकाश मेघोंके गर्जन-तर्जनसे भर रहा था। उसमें निर्गुण (बिना डोरीके) इन्द्रधनुषकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी सत्त्व-रज आदि गुणोंके क्षोभसे होनेवाले विश्वके बखेड़ेमें निर्गुण ब्रह्मकी॥ १८॥✎ 1664
धनुर्वियति माहेन्द्रं निर्गुणं च गुणिन्यभात्।
व्यक्ते गुणव्यतिकरेऽगुणवान् पुरुषो यथा॥ १८
आकाश मेघोंके गर्जन-तर्जनसे भर रहा था। उसमें निर्गुण (बिना डोरीके) इन्द्रधनुषकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी सत्त्व-रज आदि गुणोंके क्षोभसे होनेवाले विश्वके बखेड़ेमें निर्गुण ब्रह्मकी॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 261) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/20/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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