श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

न रराजोडुपश्छन्‍नः स्वज्योत्स्नाराजितैर्घनैः।

अहंमत्या भासितया स्वभासा पुरुषो यथा॥ १९

na rarājoḍupaśchannaḥ svajyotsnārājitairghanaiḥ|

ahaṃmatyā bhāsitayā svabhāsā puruṣo yathā|| 19

अर्थ

यद्यपि चन्द्रमाकी उज्ज्वल चाँदनीसे बादलोंका पता चलता था, फिर भी उन बादलोंने ही चन्द्रमाको ढककर शोभाहीन भी बना दिया था—ठीक वैसे ही, जैसे पुरुषके आभाससे आभासित होनेवाला अहंकार ही उसे ढककर प्रकाशित नहीं होने देता॥ १९॥✎ 1664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1664 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आदेशा-नुसार → आदेशानुसार

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