॥ श्रीहरिः ॥
निश्चलाम्बुरभूत्तूष्णीं समुद्रः शरदागमे।
आत्मन्युपरते सम्यङ्मुनिर्व्युपरतागमः॥ ४०
niścalāmburabhūttūṣṇīṃ samudraḥ śaradāgame|
ātmanyuparate samyaṅmunirvyuparatāgamaḥ|| 40
अर्थ
शरद् ऋतुमें समुद्रका जल स्थिर, गम्भीर और शान्त हो गया—जैसे मनके निःसंकल्प हो जानेपर आत्माराम पुरुष कर्मकाण्डका झमेला छोड़कर शान्त हो जाता है॥ ४०॥
निश्चलाम्बुरभूत्तूष्णीं समुद्रः शरदागमे।
आत्मन्युपरते सम्यङ्मुनिर्व्युपरतागमः॥ ४०
शरद् ऋतुमें समुद्रका जल स्थिर, गम्भीर और शान्त हो गया—जैसे मनके निःसंकल्प हो जानेपर आत्माराम पुरुष कर्मकाण्डका झमेला छोड़कर शान्त हो जाता है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 263) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/20/40/