श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

केदारेभ्यस्त्वपोऽगृह्णन् कर्षका दृढसेतुभिः।

यथा प्राणैः स्रवज्ज्ञानं तन्‍निरोधेन योगिनः॥ ४१

kedārebhyastvapo'gṛhṇan karṣakā dṛḍhasetubhiḥ|

yathā prāṇaiḥ sravajjñānaṃ tannirodhena yoginaḥ|| 41

अर्थ

किसान खेतोंकी मेड़ मजबूत करके जलका बहना रोकने लगे—जैसे योगीजन अपनी इन्द्रियोंको विषयोंकी ओर जानेसे रोककर, प्रत्याहार करके उनके द्वारा क्षीण होते हुए ज्ञानकी रक्षा करते हैं॥ ४१॥

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