श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

आश्‍लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम्।

जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहृतचेतसः॥ ४५

āśliṣya samaśītoṣṇaṃ prasūnavanamārutam|

janāstāpaṃ jahurgopyo na kṛṣṇahṛtacetasaḥ|| 45

अर्थ

फूलोंसे लदे हुए वृक्ष और लताओंमें होकर बड़ी ही सुन्दर वायु बहती; वह न अधिक ठंडी होती और न अधिक गरम। उस वायुके स्पर्शसे सब लोगोंकी जलन तो मिट जाती, परन्तु गोपियोंकी जलन और भी बढ़ जाती; क्योंकि उनका चित्त उनके हाथमें नहीं था, श्रीकृष्णने उसे चुरा लिया था॥ ४५॥✎ 2079

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2079 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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