श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो

यद् रामकृष्णचरणस्पर्शप्रमोदः।

मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत्

पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ॥ १८

hantāyamadrirabalā haridāsavaryo

yad rāmakṛṣṇacaraṇasparśapramodaḥ|

mānaṃ tanoti sahagogaṇayostayoryat

pānīyasūyavasakandarakandamūlaiḥ || 18

अर्थ

अरी गोपियो! यह गिरिराज गोवर्द्धन तो भगवान्‌के भक्तोंमें बहुत ही श्रेष्ठ है। धन्य हैं इसके भाग्य! देखती नहीं हो, हमारे प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण और नयनाभिराम बलरामके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके यह कितना आनन्दित रहता है। इसके भाग्यकी सराहना कौन करे? यह तो उन दोनोंका—ग्वालबालों और गौओंका बड़ा ही सत्कार करता है। स्नानपानके लिये झरनोंका जल देता है, गौओंके लिये सुन्दर हरी-हरी घास प्रस्तुत करता है, विश्राम करनेके लिये कन्दराएँ और खानेके लिये कन्द-मूल फल देता है। वास्तवमें यह धन्य है!॥ १८॥✎ 1665

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1665 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्नान-पानके → स्नानपानके

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