श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग-

श्रीकुंकुमेन दयितास्तनमण्डितेन।

तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन

लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥ १७

pūrṇāḥ pulindya urugāyapadābjarāga-

śrīkuṃkumena dayitāstanamaṇḍitena|

taddarśanasmararujastṛṇarūṣitena

limpantya ānanakuceṣu jahustadādhim|| 17

अर्थ

अरी भटू! हम तो वृन्दावनकी इन भीलनियोंको ही धन्य और कृतकृत्य मानती हैं। ऐसा क्यों सखी? इसलिये कि इनके हृदयमें बड़ा प्रेम है। जब ये हमारे कृष्ण-प्यारेको देखती हैं, तब इनके हृदयमें भी उनसे मिलनेकी तीव्र आकांक्षा जाग उठती है। इनके हृदयमें भी प्रेमकी व्याधि लग जाती है। उस समय ये क्या उपाय करती हैं, यह भी सुन लो। हमारे प्रियतमकी प्रेयसी गोपियाँ अपने वक्षःस्थलोंपर जो केसर लगाती हैं, वह श्यामसुन्दरके चरणोंमें लगी होती है और वे जब वृन्दावनके घास-पातपर चलते हैं, तब उनमें भी लग जाती है। ये सौभाग्यवती भीलनियाँ उन्हें उन तिनकोंपरसे छुड़ाकर अपने स्तनों और मुखोंपर मल लेती हैं और इस प्रकार अपने हृदयकी प्रेम-पीड़ा शान्त करती हैं॥ १७॥✎ 1817

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1817 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): कृष्ण प्यारेको → कृष्ण-प्यारेको

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें