जब भगवान्ने हँसी-हँसीमें यह बात कही तब उनके विनोदसे कुमारियोंका चित्त और भी उनकी ओर खिंच गया। वे ठंडे पानीमें कण्ठतक डूबी हुई थीं और उनका शरीर थर-थर काँप रहा था। उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—॥ १३॥✎ 1981
एवं ब्रुवति गोविन्दे नर्मणाऽऽक्षिप्तचेतसः।
आकण्ठमग्नाः शीतोदे वेपमानास्तमब्रुवन्॥ १३
जब भगवान्ने हँसी-हँसीमें यह बात कही तब उनके विनोदसे कुमारियोंका चित्त और भी उनकी ओर खिंच गया। वे ठंडे पानीमें कण्ठतक डूबी हुई थीं और उनका शरीर थर-थर काँप रहा था। उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 272) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1981 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ठंढे → ठंडे