श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तस्य तत् क्ष्वेलितं दृष्ट्वा गोप्यः प्रेमपरिप्लुताः।

व्रीडिताः प्रेक्ष्य चान्योन्यं जातहासा न निर्ययुः॥ १२

tasya tat kṣvelitaṃ dṛṣṭvā gopyaḥ premapariplutāḥ|

vrīḍitāḥ prekṣya cānyonyaṃ jātahāsā na niryayuḥ|| 12

अर्थ

भगवान्‌की यह हँसी-मसखरी देखकर गोपियोंका हृदय प्रेमसे सराबोर हो गया। वे तनिक सकुचाकर एक-दूसरीकी ओर देखने और मुसकराने लगीं। जलसे बाहर नहीं निकलीं॥ १२॥✎ 1981

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1981 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ठंढे → ठंडे

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