उनके इस शुद्ध भावसे भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए। उनको अपने पास आयी देखकर उन्होंने गोपियोंके वस्त्र अपने कंधेपर रख लिये और बड़ी प्रसन्नतासे मुसकराते हुए बोले—॥ १८॥
भगवानाहता वीक्ष्य शुद्धभावप्रसादितः।
स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीतः प्रोवाच सस्मितम्॥ १८
उनके इस शुद्ध भावसे भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए। उनको अपने पास आयी देखकर उन्होंने गोपियोंके वस्त्र अपने कंधेपर रख लिये और बड़ी प्रसन्नतासे मुसकराते हुए बोले—॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 272) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/22/18/