श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यूयं विवस्त्रा यदपो धृतव्रता

व्यगाहतैतत्तदु देवहेलनम्।

बद‍्ध्वांजलिं मूर्ध्‍न्‍यपनुत्तयेंऽहसः

कृत्वा नमोऽधो वसनं प्रगृह्यताम्॥ १९

yūyaṃ vivastrā yadapo dhṛtavratā

vyagāhataitattadu devahelanam|

baddhvāṃjaliṃ mūrdhnyapanuttayeṃ'hasaḥ

kṛtvā namo'dho vasanaṃ pragṛhyatām|| 19

अर्थ

‘अरी गोपियो! तुमने जो व्रत लिया था, उसे अच्छी तरह निभाया है—इसमें सन्देह नहीं। परन्तु इस अवस्थामें वस्त्रहीन होकर तुमने जलमें स्नान किया है, इससे तो जलके अधिष्ठातृदेवता वरुणका तथा यमुनाजीका अपराध हुआ है। अतः अब इस दोषकी शान्तिके लिये तुम अपने हाथ जोड़कर सिरसे लगाओ और उन्हें झुककर प्रणाम करो, तदनन्तर अपने-अपने वस्त्र ले जाओ॥ १९॥

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