श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः।

ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजं कृच्छ्रान्‍निर्विविशुर्व्रजम्॥ २८

ityādiṣṭā bhagavatā labdhakāmāḥ kumārikāḥ|

dhyāyantyastatpadāmbhojaṃ kṛcchrānnirviviśurvrajam|| 28

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌की यह आज्ञा पाकर वे कुमारियाँ भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई जानेकी इच्छा न होनेपर भी बड़े कष्टसे व्रजमें गयीं। अब उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं॥ २८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें