श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्की यह आज्ञा पाकर वे कुमारियाँ भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई जानेकी इच्छा न होनेपर भी बड़े कष्टसे व्रजमें गयीं। अब उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं॥ २८॥
इत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः।
ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजं कृच्छ्रान्निर्विविशुर्व्रजम्॥ २८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्की यह आज्ञा पाकर वे कुमारियाँ भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई जानेकी इच्छा न होनेपर भी बड़े कष्टसे व्रजमें गयीं। अब उनकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 274) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/28/