॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.22.34
पत्रपुष्पफलच्छायामूलवल्कलदारुभिः।
गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्मैः१ कामान् वितन्वते॥ ३४
patrapuṣpaphalacchāyāmūlavalkaladārubhiḥ|
gandhaniryāsabhasmāsthitokmaiḥ kāmān vitanvate|| 34
अर्थ
ये अपने पत्ते, फूल, फल, छाया, जड़, छाल, लकड़ी, गन्ध, गोंद, राख, कोयला, अंकुर और कोंपलोंसे भी लोगोंकी कामना पूर्ण करते हैं॥ ३४॥
टिप्पणियाँ
- १
स्थिभोगैः।