॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.22.35
etāvajjanmasāphalyaṃ dehināmiha dehiṣu|
prāṇairarthairdhiyā vācā śreya evācaret sadā|| 35
अर्थ
मेरे प्यारे मित्रो! संसारमें प्राणी तो बहुत हैं; परन्तु उनके जीवनकी सफलता इतनेमें ही है कि जहाँतक हो सके अपने धनसे, विवेक-विचारसे, वाणीसे और प्राणोंसे भी ऐसे ही कर्म किये जायँ, जिनसे दूसरोंकी भलाई हो॥ ३५॥
टिप्पणियाँ
- २
सामग्र्यं।
- ३
श्रेयआचरणं सदा।