tato nṛpa svayaṃ gopāḥ kāmaṃ svādu papurjalam|| 37
अर्थ
राजन्! यमुनाजीका जल बड़ा ही मधुर, शीतल और स्वच्छ था। उन लोगोंने पहले गौओंको पिलाया और इसके बाद स्वयं भी जी भरकर स्वादु जलका पान किया॥ ३७॥
तत्र गाः पाययित्वापः सुमृष्टाः शीतलाः शिवाः।
ततो नृप स्वयं गोपाः कामं स्वादु पपुर्जलम्॥ ३७
राजन्! यमुनाजीका जल बड़ा ही मधुर, शीतल और स्वच्छ था। उन लोगोंने पहले गौओंको पिलाया और इसके बाद स्वयं भी जी भरकर स्वादु जलका पान किया॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 281) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/22/37/