परीक्षित्! जिस समय वे यमुनाजीके तटपर हरे-भरे उपवनमें बड़ी स्वतन्त्रतासे अपनी गौएँ चरा रहे थे, उसी समय कुछ भूखे ग्वालोंने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके पास आकर यह बात कही—॥ ३८॥
तस्या उपवने कामं चारयन्तः पशून् नृप।
कृष्णरामावुपागम्य क्षुधार्ता इदमब्रुवन्॥ ३८
परीक्षित्! जिस समय वे यमुनाजीके तटपर हरे-भरे उपवनमें बड़ी स्वतन्त्रतासे अपनी गौएँ चरा रहे थे, उसी समय कुछ भूखे ग्वालोंने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके पास आकर यह बात कही—॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 281) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/22/38/