श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एवं मासं व्रतं चेरुः कुमार्यः कृष्णचेतसः।

भद्रकालीं समानर्चुर्भूयान्‍नन्दसुतः पतिः॥ ५

evaṃ māsaṃ vrataṃ ceruḥ kumāryaḥ kṛṣṇacetasaḥ|

bhadrakālīṃ samānarcurbhūyānnandasutaḥ patiḥ|| 5

अर्थ

इस प्रकार उन कुमारियोंने, जिनका मन श्रीकृष्णपर निछावर हो चुका था, इस संकल्पके साथ एक महीनेतक भद्रकालीकी भलीभाँति पूजा कीं कि ‘नन्दनन्दन श्यामसुन्दर ही हमारे पति हों’॥ ५॥✎ 1426 1427

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1426 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हाथ-में-हाथ → हाथमें-हाथ
  • #1427 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): की → कीं

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