श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

उषस्युत्थाय गोत्रैः स्वैरन्योन्याबद्धबाहवः।

कृष्णमुच्चैर्जगुर्यान्त्यः कालिन्द्यां स्नातुमन्वहम्॥ ६

uṣasyutthāya gotraiḥ svairanyonyābaddhabāhavaḥ|

kṛṣṇamuccairjaguryāntyaḥ kālindyāṃ snātumanvaham|| 6

अर्थ

वे प्रतिदिन उषाकालमें ही नाम ले-लेकर एक-दूसरी सखीको पुकार लेतीं और परस्पर हाथमें-हाथ डालकर ऊँचे स्वरसे भगवान् श्रीकृष्णकी लीला तथा नामोंका गान करती हुई यमुनाजलमें स्नान करनेके लिये जातीं॥ ६॥✎ 1426 1427

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1426 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हाथ-में-हाथ → हाथमें-हाथ
  • #1427 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): की → कीं

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