श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

चतुर्विधं बहुगुणमन्‍नमादाय भाजनैः।

अभिसस्रुः प्रियं सर्वाः समुद्रमिव निम्‍नगाः॥ १९

caturvidhaṃ bahuguṇamannamādāya bhājanaiḥ|

abhisasruḥ priyaṃ sarvāḥ samudramiva nimnagāḥ|| 19

अर्थ

उन्होंने बर्तनोंमें अत्यन्त स्वादिष्ट और हितकर भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य—चारों प्रकारकी भोजन-सामग्री ले ली तथा भाई-बन्धु, पति-पुत्रोंके रोकते रहनेपर भी अपने प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णके पास जानेके लिये घरसे निकल पड़ीं—ठीक वैसे ही, जैसे नदियाँ समुद्रके लिये। क्यों न हो; न जाने कितने दिनोंसे पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके गुण, लीला, सौन्दर्य और माधुर्य आदिका वर्णन सुन-सुनकर उन्होंने उनके चरणोंपर अपना हृदय निछावर कर दिया था॥ १९-२०॥

यह अर्थ श्लोक 19–20 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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