॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.23.20
निषिध्यमानाः पतिभिर्भ्रातृभिर्बन्धुभिः सुतैः।
भगवत्युत्तमश्लोके दीर्घश्रुतधृताशयाः॥ २०
niṣidhyamānāḥ patibhirbhrātṛbhirbandhubhiḥ sutaiḥ|
bhagavatyuttamaśloke dīrghaśrutadhṛtāśayāḥ|| 20
अर्थ
उन्होंने बर्तनोंमें अत्यन्त स्वादिष्ट और हितकर भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य—चारों प्रकारकी भोजन-सामग्री ले ली तथा भाई-बन्धु, पति-पुत्रोंके रोकते रहनेपर भी अपने प्रियतम भगवान् श्रीकृष्णके पास जानेके लिये घरसे निकल पड़ीं—ठीक वैसे ही, जैसे नदियाँ समुद्रके लिये। क्यों न हो; न जाने कितने दिनोंसे पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके गुण, लीला, सौन्दर्य और माधुर्य आदिका वर्णन सुन-सुनकर उन्होंने उनके चरणोंपर अपना हृदय निछावर कर दिया था॥ १९-२०॥