॥ श्रीहरिः ॥
यमुनोपवनेऽशोकनवपल्लवमण्डिते ।
विचरन्तं वृतं गोपैः साग्रजं ददृशुः स्त्रियः॥ २१
yamunopavane'śokanavapallavamaṇḍite |
vicarantaṃ vṛtaṃ gopaiḥ sāgrajaṃ dadṛśuḥ striyaḥ|| 21
अर्थ
ब्राह्मणपत्नियोंने जाकर देखा कि यमुनाके तटपर नये-नये कोंपलोंसे शोभायमान अशोक-वनमें ग्वाल-बालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ श्रीकृष्ण इधर-उधर घूम रहे हैं॥ २१॥
यमुनोपवनेऽशोकनवपल्लवमण्डिते ।
विचरन्तं वृतं गोपैः साग्रजं ददृशुः स्त्रियः॥ २१
ब्राह्मणपत्नियोंने जाकर देखा कि यमुनाके तटपर नये-नये कोंपलोंसे शोभायमान अशोक-वनमें ग्वाल-बालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ श्रीकृष्ण इधर-उधर घूम रहे हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 283) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/23/21/