श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अथानुस्मृत्य विप्रास्ते अन्वतप्यन् कृतागसः।

यद् विश्‍वेश्‍वरयोर्याच्ञामहन्म नृविडम्बयोः॥ ३७

athānusmṛtya viprāste anvatapyan kṛtāgasaḥ|

yad viśveśvarayoryācñāmahanma nṛviḍambayoḥ|| 37

अर्थ

परीक्षित्! इधर जब ब्राह्मणोंको यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं, तब उन्हें बड़ा पछतावा हुआ। वे सोचने लगे कि जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी आज्ञाका उल्लंघन करके हमने बड़ा भारी अपराध किया है। वे तो मनुष्यकी-सी लीला करते हुए भी परमेश्‍वर ही हैं॥ ३७॥

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