॥ श्रीहरिः ॥
तत्र गत्वौदनं गोपा याचतास्मद्विसर्जिताः।
कीर्तयन्तो भगवत आर्यस्य मम चाभिधाम्॥ ४
tatra gatvaudanaṃ gopā yācatāsmadvisarjitāḥ|
kīrtayanto bhagavata āryasya mama cābhidhām|| 4
अर्थ
ग्वालबालो! मेरे भेजनेसे वहाँ जाकर तुमलोग मेरे बड़े भाई भगवान् श्रीबलरामजीका और मेरा नाम लेकर कुछ थोड़ा-सा भात—भोजनकी सामग्री माँग लाओ’॥ ४॥
तत्र गत्वौदनं गोपा याचतास्मद्विसर्जिताः।
कीर्तयन्तो भगवत आर्यस्य मम चाभिधाम्॥ ४
ग्वालबालो! मेरे भेजनेसे वहाँ जाकर तुमलोग मेरे बड़े भाई भगवान् श्रीबलरामजीका और मेरा नाम लेकर कुछ थोड़ा-सा भात—भोजनकी सामग्री माँग लाओ’॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 281) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/23/4/