॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.23.41
अहो पश्यत नारीणामपि कृष्णे जगद्गुरौ।
दुरन्तभावं योऽविध्यन्मृत्युपाशान् गृहाभिधान्॥ ४१
aho paśyata nārīṇāmapi kṛṣṇe jagadgurau|
durantabhāvaṃ yo'vidhyanmṛtyupāśān gṛhābhidhān|| 41
अर्थ
कितने आश्चर्यकी बात है! देखो तो सही—यद्यपि ये स्त्रियाँ हैं, तथापि जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णमें इनका कितना अगाध प्रेम है, अखण्ड अनुराग है! उसीसे इन्होंने गृहस्थीकी वह बहुत बड़ी फाँसी भी काट डाली, जो मृत्युके साथ भी नहीं कटती॥ ४१॥