na tapo nātmamīmāṃsā na śaucaṃ na kriyāḥ śubhāḥ|| 42
अर्थ
इनके न तो द्विजातिके योग्य यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं और न तो इन्होंने गुरुकुलमें ही निवास किया है। न इन्होंने तपस्या की है और न तो आत्माके सम्बन्धमें ही कुछ विवेक-विचार किया है। उनकी बात तो दूर रही, इनमें न तो पूरी पवित्रता है और न तो शुभकर्म ही॥ ४२॥
नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावपि।
न तपो नात्ममीमांसा न शौचं न क्रियाः शुभाः॥ ४२
इनके न तो द्विजातिके योग्य यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं और न तो इन्होंने गुरुकुलमें ही निवास किया है। न इन्होंने तपस्या की है और न तो आत्माके सम्बन्धमें ही कुछ विवेक-विचार किया है। उनकी बात तो दूर रही, इनमें न तो पूरी पवित्रता है और न तो शुभकर्म ही॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 287) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/23/42/