यह सब होनेपर भी हम धन्यातिधन्य हैं, हमारे अहोभाग्य हैं। तभी तो हमें वैसी पत्नियाँ प्राप्त हुई हैं। उनकी भक्तिसे हमारी बुद्धि भी भगवान् श्रीकृष्णके अविचल प्रेमसे युक्त हो गयी है॥ ४९॥
अहो वयं धन्यतमा येषां नस्तादृशीः स्त्रियः।
भक्त्या यासां मतिर्जाता अस्माकं निश्चला हरौ॥ ४९
यह सब होनेपर भी हम धन्यातिधन्य हैं, हमारे अहोभाग्य हैं। तभी तो हमें वैसी पत्नियाँ प्राप्त हुई हैं। उनकी भक्तिसे हमारी बुद्धि भी भगवान् श्रीकृष्णके अविचल प्रेमसे युक्त हो गयी है॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 288) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/23/49/
टिप्पणियाँ
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प्राचीन प्रतिमें ‘अहो वयं..’ से लेकर...........‘निश्चला हरौ’ तकका पाठ नहीं है।