प्रभो! आप अचिन्त्य और अनन्त ऐश्वर्योंके स्वामी हैं! श्रीकृष्ण! आपका ज्ञान अबाध है। आपकी ही मायासे हमारी बुद्धि मोहित हो रही है और हम कर्मोंके पचड़ेमें भटक रहे हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं॥ ५०॥
नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे।
यन्मायामोहितधियो भ्रमामः कर्मवर्त्मसु॥ ५०
प्रभो! आप अचिन्त्य और अनन्त ऐश्वर्योंके स्वामी हैं! श्रीकृष्ण! आपका ज्ञान अबाध है। आपकी ही मायासे हमारी बुद्धि मोहित हो रही है और हम कर्मोंके पचड़ेमें भटक रहे हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 288) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/23/50/