श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स वै न आद्यः पुरुषः स्वमायामोहितात्मनाम्।

अविज्ञातानुभावानां क्षन्तुमर्हत्यतिक्रमम्॥ ५१

sa vai na ādyaḥ puruṣaḥ svamāyāmohitātmanām|

avijñātānubhāvānāṃ kṣantumarhatyatikramam|| 51

अर्थ

वे आदि पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हमारे इस अपराधको क्षमा करें। क्योंकि हमारी बुद्धि उनकी मायासे मोहित हो रही है और हम उनके प्रभावको न जाननेवाले अज्ञानी हैं॥ ५१॥

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