श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

इन्द्रयज्ञ-निवारण

श्रीशुक १ उवाच

भगवानपि तत्रैव बलदेवेन संयुतः।

अपश्यन्‍निवसन् गोपानिन्द्रयागकृतोद्यमान्॥ १

bhagavānapi tatraiva baladevena saṃyutaḥ|

apaśyannivasan gopānindrayāgakṛtodyamān|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ वृन्दावनमें रहकर अनेकों प्रकारकी लीलाएँ कर रहे थे। उन्होंने एक दिन देखा कि वहाँके सब गोप इन्द्र-यज्ञ करनेकी तैयारी कर रहे हैं॥ १॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    बादरायणिरुवाच।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 289)

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