श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

तदभिज्ञोऽपि भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः।

प्रश्रयावनतोऽपृच्छद् वृद्धान् नन्दपुरोगमान्॥ २

tadabhijño'pi bhagavān sarvātmā sarvadarśanaḥ|

praśrayāvanato'pṛcchad vṛddhān nandapurogamān|| 2

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण सबके अन्तर्यामी और सर्वज्ञ हैं। उनसे कोई बात छिपी नहीं थी, वे सब जानते थे। फिर भी विनयावनत होकर उन्होंने नन्दबाबा आदि बड़े-बूढ़े गोपोंसे पूछा—॥ २॥

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