श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम्।

अनीशेनान्यथा कर्तुं स्वभावविहितं नृणाम्॥ १५

kimindreṇeha bhūtānāṃ svasvakarmānuvartinām|

anīśenānyathā kartuṃ svabhāvavihitaṃ nṛṇām|| 15

अर्थ

जब सभी प्राणी अपने-अपने कर्मोंका ही फल भोग रहे हैं, तब हमें इन्द्रकी क्या आवश्यकता है? पिताजी! जब वे पूर्वसंस्कारके अनुसार प्राप्त होनेवाले मनुष्योंके कर्म-फलको बदल ही नहीं सकते—तब उनसे प्रयोजन?॥ १५॥

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