kartāraṃ bhajate so'pi na hyakartuḥ prabhurhi saḥ|| 14
अर्थ
यदि कर्मोंको ही सब कुछ न मानकर उनसे भिन्न जीवोंके कर्मका फल देनेवाला ईश्वर माना भी जाय तो वह कर्म करनेवालोंको ही उनके कर्मके अनुसार फल दे सकता है। कर्म न करने-वालोंपर उसकी प्रभुता नहीं चल सकती॥ १४॥
अस्ति चेदीश्वरः कश्चित् फलरूप्यन्यकर्मणाम्।
कर्तारं भजते सोऽपि न ह्यकर्तुः प्रभुर्हि सः॥ १४
यदि कर्मोंको ही सब कुछ न मानकर उनसे भिन्न जीवोंके कर्मका फल देनेवाला ईश्वर माना भी जाय तो वह कर्म करनेवालोंको ही उनके कर्मके अनुसार फल दे सकता है। कर्म न करने-वालोंपर उसकी प्रभुता नहीं चल सकती॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.24.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 290) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/24/14/