श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

एषोऽवजानतो मर्त्यान् कामरूपी वनौकसः।

हन्ति ह्यस्मै नमस्यामः शर्मणे आत्मनो गवाम्॥ ३७

eṣo'vajānato martyān kāmarūpī vanaukasaḥ|

hanti hyasmai namasyāmaḥ śarmaṇe ātmano gavām|| 37

अर्थ

ये चाहे जैसा रूप धारण कर सकते हैं। जो वनवासी जीव इनका निरादर करते हैं, उन्हें ये नष्ट कर डालते हैं। आओ, अपना और गौओंका कल्याण करनेके लिये इन गिरिराजको हम नमस्कार करें’॥ ३७॥

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