श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

शिलावर्षनिपातेन हन्यमानमचेतनम्।

निरीक्ष्य भगवान् मेने कुपितेन्द्रकृतं हरिः॥ १४

śilāvarṣanipātena hanyamānamacetanam|

nirīkṣya bhagavān mene kupitendrakṛtaṃ hariḥ|| 14

अर्थ

भगवान्‌ने देखा कि वर्षा और ओलोंकी मारसे पीड़ित होकर सब बेहोश हो रहे हैं। वे समझ गये कि यह सारी करतूत इन्द्रकी है। उन्होंने ही क्रोधवश ऐसा किया है॥ १४॥✎ 2081 2082

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2081 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2082 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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