श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

अपर्त्वत्युल्बणं वर्षमतिवातं शिलामयम्।

स्वयागे विहतेऽस्माभिरिन्द्रो नाशाय वर्षति॥ १५

apartvatyulbaṇaṃ varṣamativātaṃ śilāmayam|

svayāge vihate'smābhirindro nāśāya varṣati|| 15

अर्थ

वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हमने इन्द्रका यज्ञ भंग कर दिया है, इसीसे वे व्रजका नाश करनेके लिये बिना ऋतुके ही यह प्रचण्ड वायु और ओलोंके साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैं॥ १५॥✎ 2081 2082

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2081 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2082 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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